बुधवार, 20 फ़रवरी 2013


अब नहीं बदलेगी चार कोस पर बानी!

राजेश यादव 

किसी भी राष्ट्र या समाज के लिए मातृभाषा अपनी पहचान की तरह होती है। जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं। समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है। आज दुनियाभर में सैकड़ों भाषाएं समाप्ति के कगार पर हैं। दरअसल, भाषाएं आधुनिकीकरण के दौर में प्रजातियों की तरह विलुप्त होती जा रही हैं। दुनिया की तमाम भाषाएं, जो हजारों वर्षों से अस्तित्व में हैं और कहीं न कहीं आज भी अनेक समाजों की अभिव्यक्ति को शब्द देती हैं और विभिन्न मानव समुदायों की सांस्कृतिक पहचान हैं, उनके अस्तित्व को खतरा हमारी पूरी स्मृति को खतरा है। मानव सभ्यता का इतिहास इस बात का गवाह है कि सभ्यताएं अपने वर्चस्व के लिए हथियारों के साथ विचारधारात्मक उपादानों का भी सहारा लेती रही हैं। किसी भाषा का खत्म होना, उस समाज का वजूद मिट जाना है, उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना है.। आज विश्व में ऐसी कई भाषाएं और बोलियां हैं जिनका संरक्षण आवश्यक है। संरक्षण की चिंता इसलिए जरूरी है, क्योंकि ये हमारी विरासत का एक भाग है। मातृभाषा में जो भी कुछ सुंदर और श्रेष्ठ रचा जा रहा है, उसे सहेज कर रखा जाना चाहिए। पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में पाकिस्तान सरकार द्वारा उर्दू थोपे जाने के विरोध में 21 फरवरी, 1952 को ढाका में छात्रों ने अपनी मातृभाषा बांग्ला के पक्ष में जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन किया , जिसमें पुलिस और सेना की गोली से बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी मारे गए। अपनी मातृभाषा को लेकर इस तरह के प्रेम और जज्बे की दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है। मातृभाषा के सवाल से शुरू हुआ यही आंदोलन बाद में बांग्लादेश की मुक्ति  के आंदोलन में बदल गया। अपनी मातृभाषा के हक में लड़ते हुए मारे गए शहीदों की ही याद में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 17 नवंबर 1999 में दुनिया की उन भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रति वर्ष 21 फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने का निश्चय किया गया और संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा औपचारिक रूप से प्रस्ताव पारित कर 2008 में इसे मान्यता दी गई। मातृभाषा दिवस' मनाने का उद्देश्य निर्धारित किया गया- विश्व में भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिकता को बढ़ावा देना।
वजूद खो रही हैं भारत की 196 लोकभाषाएं
भारत के बारे में कहा जाता है कि यहां कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी! लेकिन अब यह कहावत बदल सकती है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार भारत में 196 लोक भाषाएं लुप्त होने को हैं। भारत के बाद दूसरे नंबर पर अमेरिका में स्थिति काफी चिंताजनक है जहां ऐसी 192 भाषाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं। एक अनुमान के अनुसार, दुनियाभर में 6900 भाषाएं बोली जाती हैं लेकिन इनमें से 2500 भाषाओं को चिंताजनक स्थिति वाली भाषाओं की सूची में रखा गया है। भारत में खत्म होने वाली भाषाओं में से ज़्यादातर क्षेत्रीय और क़बीलाई बोलियां हैं। लोकभाषाओं की चिंता इसलिए ज़रूरी है कि ये हमारी विरासत का एक भाग हैं और हमारी थाती हैं और इनमें जो भी कुछ सुंदर और श्रेष्ठ रचा जा रहा है, उसे सहेजकर रखा जाना चाहिए।
और खत्‍म हो गई एक भाषा 
 फरवरी 2010 में अंडमान निकोबार द्वीप समूह की तक़रीबन 70 हज़ार साल से बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा का अस्तित्व खत्म हो गया। संस्था सर्वाइवल इंटरनेशनल के मुताबिक़, अंडमान में रहने वाले बो क़बीले की आखिरी सदस्य 85 वर्षीय बोआ सीनियर की मौत के साथ ही इस आदिवासी समुदाय की भाषा ने भी दम तो़ड दिया। इसी के साथ इस समाज की संस्कृति और सभ्यता भी खत्म हो गई। ग्रेट अंडमान में कुल 10 मूल आदिवासी समुदायों में से एक बो समुदाय की इस आखिरी सदस्य ने 2004 की सुनामी में अपना घरबार खो दिया था। वह स्ट्रैट द्वीप पर सरकार द्वारा बनाए गए शिविर में ज़िंदगी के आखिरी दिन गुज़ार रही थीं। भाषाई विशेषज्ञों का मानना है कि बो भाषा अंडमान में प्री-नियोलोथिक के व़क्त से इस समुदाय द्वारा बोली जा रही थी। अंडमान पर रहने वाले आदिवासियों को चार वर्गों में बांटा जा सकता है-द ग्रेट अंडमानी, जारवा, ओंग और सेंटिनीलीस. तक़रीबन 10 भाषाई समूहों में विभाजित ग्रेट अंडमान के मूल निवासियों की आबादी साल 1858 में यहां ब्रिटिश कॉलोनी बनने तक 5500 से ज़्यादा थी।  फिलहाल ग्रेटर अंडमान में 52 मूल निवासी बचे हैं। लेकिन इनका वजूद भी खतरे में है।
ठेठ आदिवासी भाषाओं पर विलुप्ति का खतरा
यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में ठेठ आदिवासी भाषाओं पर विलुप्ति का खतरा बढ़ता ही जा रहा है। भारत के हिमालयी राज्यों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड आदि में तक़रीबन 44 भाषाएं-बोलियां ऐसी हैं, जो जनजीवन से ग़ायब हो रही हैं, जबकि ओडिसा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसी तक़रीबन 42 भाषाएं खत्म हो रही हैं।  1961 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में 1652 भाषाएं थीं, जो 2011 में घटकर महज़ 234 ही रह गईं। दुनिया भर में स़िर्फ 65 भाषाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें एक करो़ड से ज़्यादा लोग बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं।इनमें 11 भारतीय भाषाएं भी शामिल हैं। इनमें से एक भाषा हिंदी भी है।
मातृभाषा की बदौलत ऊँचाइयों को छू रहे
दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश मातृभाषा की बदौलत ऊँचाइयों को छू रहे हैं। जापान हमारे सामने इसका आदर्श नमूना है। वह विश्‍व बाज़ार में एक आर्थिक और औद्योगिक शक्ति है और इस मुकाम तक वह अपनी मतृभाषा की बदौलत पहुंचा है। दूसरी तरफ़ हम चीन का उदाहरण भी ले सकते हैं जो विश्‍व पटल पर एक महा शक्ति बन कर उभरा है। अग़र उसके भी विकास के इतिहास को देखें तो पाते हैं कि उसकी मातृभाषा मंदारिन का इसमें अहम योगदान है। अन्तर्राष्ट्रीय मानचित्र पर अंग्रेज़ी के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। किन्तु वैश्‍विक दौड़ में आज हिंदी  कहीं भी पीछे नहीं है। यह सिर्फ़ बोलचाल की भाषा ही नहीं, बल्कि सामान्य काम से लेकर इंटरनेट तक के क्षेत्र इसका प्रयोग बख़ूबी हो रहा है। हमें यह अपेक्षा अवश्य है कि क्षेत्र के शासकीय कार्यालयों में सभी कामकाज हिन्दी में हो। और क्षेत्र में भी निर्धारित प्रतिशत के अनुसार हिन्दी का प्रयोग होता रहे। भूमण्डलीकरण के इस दौड़ में देशों की भौगोलिक दूरियां मिटती जा रही है। समय और गति आज महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। बाज़ार भाषा, व्यापार जगत का मापदण्ड होता जा रहा है। अतः यह ज़रूरी है कि हम अपनी कमियों को समझें। अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये योजनायें बनाएं। साथ ही भूमण्डलीकरण के वर्तमान परिवेश में अपनी संभानाओं को विकसित करने के लिये प्रयत्नशील रहें। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा जरुर है लेकिन इसके साथ ही हर क्षेत्र की अपनी कुछ बोलियां और भाषाएं भी है जिसे बचाकर रखना बेहद जरुरी है। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर जिस सवाल पर हमें गहराई से विचार करने की आवश्यकता है, वह है- अपनी मातृभाषाओं की कीमत पर अंग्रेजी जैसी भाषा के आगे घुटने टेकना कहां तक उचित है? मातृभाषाओं के विकास के लिए जरूरी है कि सरकार बोलियों और छोटी भाषाओं में भी रोजगार के अवसर पैदा करे।

बाक्‍स
लुप्त होती भारतीय बोलियां और भाषाएं

भाषा                       क्षेत्र               बोलने वालों की संख्या
ग्रेट अंडमानी           अंडमान द्वीप समूह                      05
जारवा                      अंडमान द्वीप समूह                       31
ऑगे                   अंडमान द्वीप समूह               50  
सेंतीनली                 अंडमान द्वीप समूह              50
हतंगम                 अंडमान द्वीप समूह                50
ताई रोंग               अरुणाचल प्रदेश                  100
ताई नोरा                अरुणाचल प्रदेश                   100
शोम्पेन ग्रेट              निकोबार समूह                    100
रूगा                     मेघालय                        100
वाहंडूरी                  हिमाचल प्रदेश                    138
ना                     अरुणाचल प्रदेश                   350
म्रा                     अरुणाचल प्रदेश                   350
लामोंज लिटिल            निकारोबार द्वीप                   400
कुंडल  शाही           पाक अधिकृत कश्मीर                500
पुरूम                  मणिपुर                          503
कोरो                   अरुणाचल प्रदेश                   800-1000
ताराओ                 मणिपुर                         870
टोटो                पश्चिम बंगाल                              1000
मेच              असम और पश्चिम बंगाल                1000
टोडा                     तमिलनाडू                      1006
स्रोत : एटलस ऑफ वल्ड्‌र्स लार्जेस्ट लैंग्वेज इन डेंजर , यूनेस्को प्रकाशन, पेरिस



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